Thursday, April 9
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राजस्थान के अजमेर शहर से धार्मिक भावनाओं को आहत कर देने वाला एक बेहद संगीन मामला उजागर हुआ है। अजमेर के विनय नगर में स्थित श्री चैतन्य महाप्रभु जी मंदिर से बेशकीमती जेवरात और मूर्तियां तथाकथित और आपराधिक तरीके से मंदिर परिसर से हटा दी गयी हैं और आरोपित कृष्ण केशव इस संगीन में हाथ बताया जाता है।

पुलिस अधिक्षक अजमेर को दिये गये एक दस्तावेज (ज्ञापन) में ज्ञापनदाता और उनके भक्तों ने आरोप लगाया कि उक्त प्रकरण संगीन और आपराधिक है साथ ही श्री चैतन्य महाप्रभुजी के भक्तगणों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है

अजमेर के अलवर गेट थाने में पुलिस को अपना ब्यान दर्ज कराने के बाद हरे कृष्णा दास(शैलेश) का कहना है कि उन्होंने भक्तों के साथ आजमेर के अलवर गेट थाना में अपना और साथियो का बयान दर्ज करवाकर पुलिस अधीक्षक अजमेर से सख्ता कानूनी कार्यवाही करने की मांग करते हुए आरोपी कृष्ण केशव के खिलाफ पूलिप कार्यवाही का आग्रह किया है

ज्ञापन की कॉपी 1

सेवा में,श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय, अजमेर (जिला- अजमेर)विषय-गौड़िय वैष्णव सम्प्रदाय (श्री चैतन्य महाप्रभुजी) के विनय नगर पालबीछला अजमेर स्थित मंदिर के बेशकीमती जेवरात व मूर्तियां खुर्द-बुर्द कर देने बाबत।महोदय,निवेदन है कि श्री चैतन्य महाप्रभुजी की धार्मिक विचारधारा करीब 500 वर्षों से भी अधिक समय से देश विदेश में पल्लवित होती चली आ रही है जिसका उद्देश्य देश एवं विदेश में भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप व विचारों, धार्मिक कार्यक्रमों को विस्तृत रूप से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर कर जीवात्माओ को भगवान की ओर लगाने का रहा है। इसी क्रम में अजमेर शहर मे प्रथम बार वर्ष 1957 में नित्य लीला प्रविष्ठ गुरूदेव श्री वासुदेव शरण जी महाराज का आगमन हुआ एवं गोड़ीय वैष्णव समुदाय के धार्मिक कृत्यों को पल्लवित करने हेतु प्रयास प्रांरभ किये गये एवं श्री चैतन्य सम्प्रदाय का अजमेर शहर मे प्रचार कार्य प्रारंभ किया एवं अनेकानेक व्यक्ति इस कार्य से प्रेरित होकर जुडते चले गये। इस प्रकार अनुयायियों की संख्या मे बढोतरी होती चली गई। वर्ष 1966 में सर्वप्रथम गुरुदेव श्री वासुदेव शरण जी महाराज द्वारा शिष्यों के सहयोग से अजमेर स्थित विनय नगर पालबीछला मे एक मंदिर हेतु भूमि लेकर धीरे-धीरे मंदिर का निर्माण किया गया। वर्ष 1969 में श्री चैतन्य महाप्रभु एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रहो की प्रतिष्ठा की गई तथा वर्ष 1986 में गौर गदाधर जी के विग्रहो की प्रतिष्ठा की गई, यह स्थान आज श्री चैतन्य महाप्रभु जी मंदिर के नाम से 70 वर्षों से अधिक समय से विख्यात है एवं प्रारंभ से ही अनेकानेक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहा है। चूंकि इस सम्प्रदाय के श्री वासुदेव शरण जी महाराज प्रेरणा स्त्रोत रहे इस कारण से जन आर्थिक सहयोग द्वारा उक्त मंदिर के निर्माण का कार्य प्रांरभ किया गया जो आज अपने विराट स्वरूप मे विद्यमान है एवं आचार्य व समिति द्वारा सम्प्रदाय के कार्यों का निष्पादन किया जाने लगा ।श्री वासुदेव शरण जी महाराज पूर्व मे गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे परन्तु गुरू की प्रेरणा से उन्होने गृहस्थाश्रम को त्याग कर विरक्त रहते हुए अपने गुरुभाई श्री चक्रधर प्रसाद ब्रह्मचारी जी के साथ धर्म प्रचार करने लगे, उनकी पत्नी अपने दोनो पुत्रों के साथ वृदांवन वास करने लगी, शिष्यों को इस बात की जानकारी पत्नी को वृदांवन से बुलाया होने पर उन्होने श्री वासुदेव शरण जी महाराज की पत्नी तथा वे भी अपने पुत्रों के साथ यही पर निवास करने लगी एवं भक्तिभाव से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा आराधना मे सलंगन रहने लगी।

ज्ञापन 2

धार्मिक उद्देश्यो के प्रचार प्रसार हेतु श्री वासुदेव शरण जी महाराज बाहर जाते तो उनके शिष्य मंदिर में रहते थे तथा ठाकुर जी की पूजा एवं गौसेवा आदि सभी सेवा कार्य किया करते थे। श्री वासुदेव शरण जी महाराज ने अपने स्वास्थ्य खराब होने के कारण अपने सामने ही श्री चक्रधर प्रसाद ब्रह्मचारी जी को सन् 1992 में गद्दी पर अभिशिक्त कर दिया था। वर्ष 1992 मे श्री वासुदेव शरण जी महाराज का देवलोक गमन हो गया तथा परम्परा के अनुसार श्री वासुदेव शरण जी महाराज के पश्चात श्री चक्रधर प्रसाद ब्रहमचारी जी को मंदिर की सम्पति के प्रबंधन एवं प्रमुख आचार्य के रूप में गद्दी पर विराजमान किया गया तथा उनकी देखरेख में मंदिर के समस्त कार्यों का निर्वहन किया जाने लगा।विशेषतः होली के अवसर पर आयोजित होने वाले श्री चैतन्य महाप्रभुजी के प्राकट्य महोत्सव जो मंदिर की पुरातन परम्परा रही, आचार्य व शिष्यों व जन सहयोग से लगातार वर्ष 2021 तक आयोजन किया जाता रहा।वर्ष 2015 में श्री वासुदेव शरण जी महाराज के बडे पुत्र पुरूषोत्तम दास का देवलोकगमन हो गया तथा वर्ष 2018 में उनके पुत्र श्यामसुन्दर दास का गोलोकगमन हो गया। वासुदेव शरण जी महाराज के गोलोकगमन के बाद उनके पुत्र श्यामसुंदरदास जी द्वारा मंदिर के कार्यों में हस्तक्षेप किया जाने लगा तथा मंदिर की सेवा हेतु शिष्यों व जनमानस द्वारा दी जाने वाली सेवा राशिर/उपहार का दुरूपयोग किया जाने लगा परन्तु गुरू पुत्र होने के कारण शिष्यों के द्वारा कोई प्रत्यक्ष रूप से विरोध जाहिर नहीं किया गया। वर्ष 2018 में श्यामसुन्दर जी की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र कृष्ण केशव द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक प्रबंध अपने हाथ में लिया गया। यहां तक कि कृष्ण केशव का खान पान, रहन सहन व नैतिक चरित्र भी वैष्णव धर्म की शिक्षाओं के पूर्णतया विपरित रहा जब कि तत्समय विराजमान आचार्य श्री चक्रधर महाराज द्वारा भी उसे समझाने का प्रयास किया परन्तु उसका सुधार नहीं हुआ। इसके विपरित उसकी रूची अनैतिक कार्यों में और बढ़ती चली गई एवं असामाजिक कृत्यों में सलंग्न व्यक्तियों के साथ उठना बैठना प्रारंभ कर दिया, संघ के सदस्यों के साथ भी अभद्र व्यवहार करना शुरू कर दिया। इस कारण से मंदिर में आने वाले भक्तो की संख्या मे उत्तरोतर कमी होती चली गईBachवर्ष 2021 मे श्री चक्रधर महाराज का असामयिक गोलोकगमन (निधन) हो गया था। उनके बाद उनकी इच्छा अनुसार उनके शिष्य श्री हरे कृष्ण दास ब्रह्मचारी (शैलेश) जो कि इस मंदिर में 20 वर्षों से मंदिर की सेवा पूजा कर रहे थे को सभी भक्तों द्वारा उतराधिकारी के रूप में गद्दी पर अभिशिक्त किया गया।.

ज्ञापन 3

इसी अन्तराल में कृष्ण केशव द्वारा मंदिर की गतिविधियों का अविधिक रूप से संचालन प्रारंभ कर दिया गया जिस पर काफी विवाद हुआ।इस मंदिर मे श्री वासुदेव शरण जी महाराज के समय से जन सहयोग द्वारा निर्मित मंदिर एवं समिति द्वारा 60-70 वर्षों में जो कार्य किये गये उनमे मुख्य रूप से मंदिर की सम्पति में वृद्धि हुई जिसमे ठाकुर जी के सिंहासन स्वरूप करीब 40 किलो का चांदी का सिंहासन, मुकुट, छत्र एवं अन्य कीमती आभूषण, चांदी के बर्तन, बहुमूल्य धार्मिक ग्रंथों का भंडार जो जनता की सहयोग राशि से एकत्रित की गई थी को श्री कृष्ण केशव के द्वारा मंदिर के आचार्य की स्वीकृति, समिति के सदस्यों की स्वीकृति के बिना खुर्द बुर्द कर दिया गया।उपरोक्त वर्णित सम्पति जिसमे मंदिर व मंदिर की मूर्तिया, सोने चांदी की सामग्री, धार्मिक ग्रंथ, बर्तन एवं अन्य पूजा अर्चना में काम में आने वाले सामान जो कि कृष्ण केशव की निजी सम्पति नही थी वरन सम्पूर्ण समाज के अनुदान से एकत्रित की गई थी को खुर्द बुर्द कर आपराधिक कृत्य किया गया है।चूंकि मंदिर शास्वत नाबालिग है एवं इस सम्प्रदाय के नियमों के अनुसार मंदिर की समस्त सम्पति अवयस्क सम्पति है जिस पर अधिकार एवं स्वामित्व विग्रह या अधिशाखा का होता है को खुर्द बुर्द कर विधि विरूद्व कृत्य किया है जो कि स्वयं मे अपराध है। मंदिर मूर्तियों के चांदी के मुकुट व सोने के अन्य आभूषणों की कीमत करोडो रूपयों के आस पास है जिसका बतौर निजी सम्पति कृष्ण केशव के द्वारा दुरूपयोग किया गया है।मंदिर में 60 से अधिक वर्ष पुरानी पुरातत्व महत्व की करोड़ों रूपए मूल्य की मूर्तियों को भी हटाकर एक ओर जहां भक्तों की भावनाओं को आहत किया है वहीं दूसरी ओर करोड़ों रुपयों की क्षति कारित की हैं। अब मंदिर में दोनों समय की पूजा आरती भी बंद है, जिससे आम जन में आक्रोश है, मंदिर की संपत्ति गायब करने के बाद कृष्ण केशव लापता हो गया है। शक है कि उसने मंदिर के जेवरात व मूर्तियों को करोडों रुपयों में बेचान करके अनुचित लाभ कमाया है।

ज्ञापन 4

अतः निवेदन है कि मामले में प्रथम सूचना दर्ज करके दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध उचित कानूनी कार्यवाही कर मूर्तियों व जेवरात बरामद करने ओर दंडित करवाने की कृपा करें। मंदिर को भी पूर्ववत खुलवाकर नियमित पूजा अर्चना की अनुमति देने की कृपा करें।सलग्न :–. (६८ पृष्ठ)1. प्रतिवर्ष होली पर होने वाले वाले मुख्य कार्यक्रम के प्रोग्राम पत्र की प्रतिया ।2. प्रतिवर्ष होली पर निकलने वाली शोभायात्रा में प्रशासनिक व्यवस्थाओं हेतु दिए गए स्वीकृति पत्र एवं जारी स्वीकृती पत्रों की प्रतियां।3. विभिन्न भक्तों द्वारा मंदिर सेवा कार्य हेतु दी गई सेवा राशि से संबंधित पत्रों की प्रतिया।अजमेरदिनांक- 6/4/2026प्रार्थी(हरे कृष्ण दास ब्रह्मचारी उर्फ शैलेश) एवं समस्त भक्तगण

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