नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने का खुद उनके और उनकी पार्टी के लिए क्या मायने हैं?

VISHNU AGARWAL/EDITOR DAILY INDIATIMES/DAILY JAIPUR TIMES
नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं, इसमें अब कोई संशय नहीं रह गया है। बिहार में कोई और मुख्यमंत्री बनेगा। संभवतः बीजेपी का कोई नेता बनेगा। बीजेपी और जद(यू) ने पिछले साल नवंबर में जब मिल कर बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा था तब जनता को बताया था कि चुनाव सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है। लेकिन, उन्होंने नीतीश को चुनाव बाद का ‘सीएम चेहरा’ बताने से अंत तक परहेज किया
आपका ‘सीएम फ़ेस’ कौन है? इस सवाल के जवाब में बीजेपी के बड़े नेता अंत तक यही कहते रहे थे कि नीतीश कुमार बिहार के सीएम हैं, चुनाव उन्हीं के मुख्यमंत्रित्व में लड़ा जा रहा है। चुनाव बाद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत विधायक जिसे अपना नेता चुनेंगे वह मुख्यमंत्री बनेगा
चुनाव नतीजे ऐसे आए कि बीजेपी के पास नीतीश को नेता मानने के अलावा तब कोई विकल्प नहीं बचा था। तब ऐसा संदेश भी गया कि एनडीए की इस प्रचंड जीत के नायक नीतीश कुमार ही हैं। इसलिए मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया गया। लेकिन, चार महीना भी नहीं बीता कि नीतीश को बिहार की कुर्सी छोड़ने के लिए राजी कर लिया गया।
नीतीश के ‘अच्छे नंबर’ से ही हो गया खेला
बीजेपी के कई नेता लंबे समय से बिहार में अपना सीएम बनवाने की मांग करते रहे हैं। चुनाव के समय भी यह भावना जोर पकड़े हुए थी। चुनाव बाद आए नतीजों से इसे हकीकत में बदलने का रास्ता साफ हो गया।बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में नीतीश का अच्छा प्रदर्शन रहा और भाजपा का भी। 2020 के चुनाव में एनडीए को 122 और महागठबंधन को 114 सीटें मिली थीं। लेकिन, 2025 में महागठबंधन मात्र 35 सीटों पर सिमट गई और एनडीए को 202 (भाजपा 89, जदयू 85) सीटें मिलीं।
इस प्रदर्शन के साथ नीतीश के लिए पाला बदलने की हर संभावना खत्म हो गई। ऐसे में भाजपा के लिए नीतीश को सीएम पद से हटाने के लिए राजी करना चुनौती भरा काम नहीं रह गया।
मालूम हो कि नीतीश इससे पहले भाजपा का साथ छोड़ कर राजद से हाथ मिला चुके हैं और सरकार चला चुके हैं। फिर एक दिन, अचानक उन्होंने इस्तीफा दे दिया और तुरंत एनडीए सरकार के सीएम के तौर पर शपथ भी ले ली।
सीधे मुक़ाबले से पहले ही ‘संन्यास’ ले चुके हैं नीतीश
नीतीश कुमार 1977, 1980 और 1985 में लगातार विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीते केवल 1985 में। इसके बाद वह ‘दिल्ली कूच’ कर गए। वह 1989, 1991, 1996,1998, 1999 और 2004 में लोकसभा चुनाव लड़े।1989 से लगातार चार चुनावों में नीतीश बाढ़ से सांसद रहे। 2004 में वह बाढ़ और नालंदा से चुनाव लड़े थे। बाढ़ के लोगों ने उन्हें हरा दिया, जबकि नालंदा वालों ने सांसद चुन लिया। उसके बाद से नीतीश कुमार कभी सीधे चुनावी मैदान में नहीं उतरे। नवम्बर 2005 से अब तक (2014-15 में नौ महीनों को छोड़ कर) वह बिहार के सीएम हैं, लेकिन वह विधान परिषद से ही सदस्य बनते रहे।
नीतीश पर एक और ‘यू-टर्न’ का लग सकता है तमगा
राजनीति के शुरुआती दिनों में नीतीश की छवि एक सिद्धांतवादी नेता की थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में उनकी छवि समझौतावादी नेता की बन गई है। यहां तक कि उनके विरोधियों ने उनका नाम ही ‘पल्टू कुमार’ या ‘पल्टू चाचा’ रख दिया थादिल्ली से पटना और एक बार फिर दिल्ली वापसी के साथ ही नीतीश कुमार पर एक और ‘यू-टर्न’ का तमगा लग सकता है। खबर है कि उन्होंने 50 पार कर चुके अपने बेटे निशांत का राजनीतिक करियर शुरू करवाने का भी मन बना लिया है और इसका खाका भी तैयार किया जा चुका है। ऐसा हुआ तो नीतीश पर परिवारवाद के प्रति अपने सिद्धांत से समझौता करने का आरोप लगना भी तय है।नीतीश के करीबी कुछ नेताओं का कहना है कि एक समय ‘नेता जी’ (नीतीश कुमार) का साफ कहना था कि मेरे रहते निशांत को राजनीति में लाने की बात नहीं की जाए।हाल के दिनों में निशांत की सक्रियता बढ़ी है और माना जा रहा है कि ‘पिता की आज्ञा से’ वह भी राजनीति में उतरने के लिए तैयार हैं। जदयू के कई नेता निशांत के राजनीति में आने की वकालत करते रहे हैं।