Keoladeo National Park: केवलादेव नेशनल पार्क में पक्षियों के प्रवास को समझने के लिए ‘बर्ड रिंगिंग’ अभियान फिर शुरू हुआ है। डॉ. सलीम अली के शिष्य अली हुसैन विशेषज्ञों को पक्षियों को सुरक्षित पकड़ने का हुनर सिखा रहे हैं। पक्षियों के पंजों में कोड वाले छल्ले पहनाकर उनके वजन और लंबी उड़ानों का वैज्ञानिक डेटा जुटाया जाएगा।
RAJESH KUMAR/JOURNALIST/BHARATPUR NEWS/DAILY INDIATIMES DIGITAL JOURNALISM PLATFORM

भरतपुर: विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के आकाश में एक बार फिर विज्ञान और प्रकृति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। पूरे 42 साल के लंबे इंतजार के बाद यहां ऐतिहासिक ‘बर्ड रिंगिंग’ अभियान की वापसी हुई है। साल 1984 में जब इस अभयारण्य को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था, तब कुछ तकनीकी आपत्तियों के कारण इस वैज्ञानिक अध्ययन पर रोक लगा दी गई थी। अब वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ने मिलकर इस मिशन को दोबारा जीवंत किया है।

क्यों पहनाई जाती है पक्षियों को ‘अंगूठी’
बर्ड रिंगिंग का मुख्य उद्देश्य प्रवासी पक्षियों के रहस्यमयी संसार को समझना है। विशेषज्ञ पक्षियों को बिना नुकसान पहुंचाए सावधानी से पकड़ते हैं। इसके बाद उनके वजन, पंखों की लंबाई और लिंग का डेटा दर्ज किया जाता है। अंत में, पक्षी के पंजे में एक हल्का धातु या प्लास्टिक का छल्ला पहनाया जाता है जिस पर अंतरराष्ट्रीय मानकों के यूनिक कोड दर्ज होते हैं। जब यही पक्षी दुनिया के किसी दूसरे कोने में दोबारा देखे जाते हैं, तो वैज्ञानिक यह जान पाते हैं कि इन नन्हे परिंदों ने कितनी दूरी तय की और उनका मार्ग क्या था।

83 साल के उस्ताद: अली हुसैन का जादुई हुनर
इस अभियान का सबसे रोचक पहलू 83 वर्षीय अली हुसैन हैं। बिहार के बेगूसराय के रहने वाले अली हुसैन ने महज 17 साल की उम्र में ‘बर्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहे जाने वाले डॉ. सलीम अली से पक्षी पकड़ने की कला सीखी थी। अली हुसैन नीम के गोंद और धागे के फंदे से पक्षियों को इतनी सफाई से पकड़ते हैं कि उन्हें खरोंच तक नहीं आती।

वन्यजीव विशेषज्ञों को ट्रेनिंग देने के लिए अमेरिका बुलाया
उनकी यह दक्षता इतनी प्रसिद्ध है कि उन्हें अमेरिकी वन्यजीव विशेषज्ञों को ट्रेनिंग देने के लिए अमेरिका तक बुलाया गया था। जयपुर के वन्यजीव विशेषज्ञ हर्षवर्धन के पास आज भी उस ऐतिहासिक यात्रा की तस्वीरें मौजूद हैं। केवलादेव के स्थानीय गाइड बच्चू सिंह और रणधीर सिंह जैसे विशेषज्ञ अब अली हुसैन से इस पारंपरिक हुनर की बारीकियां सीख रहे हैं।

जब रूस पहुंचा राजस्थानी मेहमान
केवलादेव में 1960-70 के दशक में हुए अध्ययनों ने चौंकाने वाले आंकड़े दिए थे।पिनटेल बतख: 1966 में रिंग पहनाई गई, जो 102 दिन बाद 2,380 किमी दूर रूस के कराकल्पासकाया में मिली।विजन पक्षी: 1967 में भरतपुर से उड़ा और 125 दिन में 3,875 किमी दूर रूस के इरकुत्स्क पहुंच गया।गार्गेनी: यह पक्षी महज 136 दिन में रूस के चेर्नोबिल क्षेत्र तक जा पहुंचा था।

अगला पड़ाव: सांभर और चंबल
राजस्थान के बाद अब यह अभियान उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, नरोरा और बिजनौर में भी चलाया जाएगा। सांभर झील में खारे पानी की वजह से छल्लों पर असर पड़ रहा था, इसलिए अब चंबल में प्रजनन करने वाले दुर्लभ ‘इंडियन स्किमर’ पर रिंग लगाने की विशेष तैयारी की जा रही है। 42 साल बाद शुरू हुआ यह अभियान न केवल पक्षी संरक्षण को मजबूती देगा, बल्कि बदलते पर्यावरण में प्रवासी पक्षियों के बदलते रास्तों की नई जानकारी भी साझा करेगा।